क्‍या होती है प्लाज्मा थैरेपी | ये कैसे काम करती है | What is Plasma Therapy-How Does It Work

क्‍या होती है प्लाज्मा थैरेपी | ये कैसे काम करती है | What is Plasma Therapy-How Does It Work

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What is Plasma Therapy In Hindi
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क्‍या होती है प्लाज्मा थैरेपी-What is Plasma Therapy In Hindi

प्लाज्मा थेरेपी में कोरोना संक्रमण से मुक्त हो चुके व्यक्तियों के खून से प्लाज्मा निकालकर दूसरे कोरोना वायरस संक्रमित रोगी को चढ़ाया जाता है। दरअसल संक्रमण से ठीक हुए व्यक्ति के शरीर में उस वायरस के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बन जाती है और 3 हफ्ते बाद उसे प्लाज्मा के रूप में किसी संक्रमित व्यक्ति को दिया जा सकता है ताकि उसके शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगे। प्लाज्मा संक्रमण से ठीक हुए व्यक्ति के खून से अलग कर निकाला जाता है। एक बार में एक संक्रमण से ठीक हुए व्यक्ति के शरीर से 400ml प्लाज्मा निकाला जा सकता है। इस 400ml प्लाज्मा को दो संक्रमित मरीजों को दिया जा सकता है।

जब कोई वायरस किसी व्यक्ति पर हमला करता है तो उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज कहे जाने वाले प्रोटीन विकसित करती है | अगर वायरस से संक्रमित किसी व्यक्ति के ब्लड में पर्याप्त मात्रा में एंटीबॉडीज विकसित होता है तो वह वायरस की वजह से होने वाली बीमारियों से ठीक हो सकता है


प्लाज्मा थेरेपी से इलाज कैसे किया जाता है-How is treatment with plasma therapy 

इलाज कोरोना से ठीक हो चुके एक व्यक्ति के शरीर से निकाले गए खून से कोरोना पीड़ित चार अन्य लोगों का इलाज किया जा सकता है. प्लाज्मा थेरेपी सिस्टम इस धारणा पर काम करता है कि जो मरीज किसी संक्रमण से उबर कर ठीक हो जाते हैं उनके शरीर में वायरस के संक्रमण को बेअसर करने वाले प्रतिरोधी एंटीबॉडीज विकसित हो जाते हैं. इसके बाद उस वायरस से पीड़ित नए मरीजों के खून में पुराने ठीक हो चुके मरीज का खून डालकर इन एंटीबॉडीज के जरिए नए मरीज के शरीर में मौजूद वायरस को खत्म किया जा सकता है। प्लाज्मा थेरेपी कोई नई थेरेपी नहीं है। डॉक्टरों का मानना है की ये एक प्रॉमिनेंट थेरेपी है जिसका फायदा भी हुआ और कई वायरल संक्रमण में इसका इस्तेमाल भी हुआ है।

कान्वलेसन्ट प्लाज्मा थेरेपी के पीछे आइडिया यह है कि इस तरह की रोग प्रतिरोधक क्षमता ब्लड प्लाज्मा थेरेपी के जरिए एक स्वस्थ व्यक्ति से बीमार व्यक्ति के शरीर में ट्रांसफर की जा सकती है |
कान्वलेसन्ट प्लाज्मा का मतलब कोविड-19 संक्रमण से ठीक हो चुके व्यक्ति से लिए गए ब्लड के एक अवयव से है | प्लाज्मा थेरेपी में बीमारी से ठीक हो चुके लोगों के एंटीबॉडीज से युक्त ब्लड का इस्तेमाल बीमार लोगों को ठीक करने में किया जाता है |

आसाना भाषा में ऐसे में जो मरीज अभी अभी इस वायरस से ठीक हुआ है, उसके शरीर में एंटीबॉडी बना होता है, वही एंटबॉडी उसके शरीर से निकालकर दूसरे बीमार मरीज में डाल दिया जाता है। वहां जैसे ही एंटीबॉडी जाता है मरीज पर इसका असर होता है और वायरस कमजोर होने लगता है, इससे मरीज के ठीक होने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है।



कौन होता है प्लाज्मा डोनर-Who is plasma donor-Kon Hota hai Plasma donor

कोविड-19 में इलाज से ठीक हुए लोग ही इस थेरेपी में डोनर बन सकते हैं। इस थेरेपी के लिए जारी दिशा-निर्देश के मुताबिक, "किसी मरीज के शरीर से एंटीबॉडीज उसके ठीक होने के दो हफ्ते बाद ही लिए जा सकते हैं और उस रोगी का कोविड-19 का एक बार नहीं, बल्कि दो बार टेस्ट किया जाना चाहिए।"
ठीक हो चुके मरीज का एलिजा (एन्जाइम लिन्क्ड इम्युनोसॉर्बेन्ट ऐसे) टेस्ट किया जाता है जिससे उनके शरीर में एंटीबॉडीज की मात्रा का पता लगता है। लेकिन ठीक हो चुके मरीज के शरीर से रक्त लेने से पहले राष्ट्रीय मानकों के तहत उसकी शुद्धता की भी जांच की जाती है।


कितना कारगर है प्लाज्मा से इलाज-How effective is plasma treatment

डॉ | संदीप कहते हैं, "इस नई थेरेपी के इस्तेमाल से कोविड-19 के इलाज में एक नई तकनीक जरूर जुड़ गई है। लेकिन हमें ये भी समझना होगा कि ये कोई जादू की छड़ी नहीं है। हमने अपने मरीज पर कोविड-19 के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी के साथ-साथ बाकी दूसरे तरीकों को इलाज में शामिल रखा। जिससे ये पता चलता है कि ये प्रक्रिया 'केटेलिस्ट' यानी उत्प्रेरक का काम करती है। केवल प्लाज्मा थेरेपी से ही सब ठीक हो रहे हैं, ऐसा नहीं है।"



प्लाज्मा थेरेपी का पहला मरीज-First patient of plasma therapy

दिल्ली के इस मरीज की उम्र 49 साल है। इन्हें 4 अप्रैल को अस्पताल में बुखार और सांस लेने की दिक्कत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इनकी तबीयत धीरे-धीरे और बिगड़ती चली गई, फिर इन्हें ऑक्सीजन पर रखने की नौबत आ गई। उन्हें निमोनिया हो गया और 8 अप्रैल आते-आते मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ी। इसके बाद परिवार ने डॉक्टरों से प्लाज्मा थेरेपी के जरिए इलाज करने की गुजारिश की।

परिवार ने प्लाज्मा के लिए डोनर भी खुद ही ढूंढा और 14 अप्रैल को नए तरीके के साथ इलाज शुरू किया गया। मरीज 18 अप्रैल से वेंटिलेटर सपोर्ट पर नहीं हैं और फिलहाल स्वस्थ बताए जा रहे हैं। हालांकि डॉक्टरों ने उन्हें अपनी निगरानी में अस्पताल में ही रखा है।


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